वो भी क्या दिन थे

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वो दिन भी क्या दिन थे
आसमा में बदल कुछ काम थे
नदी किनारे बैठे हम थे
और यादो में बस तुम थे,

उल्फत तो जिंदगी में थी हज़ार
वो जो चली थी बाजार,

सोचा था संग तुम्हारे हम हो ले
पुरानी यादो को-वो बातो को ताज़ा कर ले,

बस हमने मन बनाया ही था
सपनो को सजाया ही था 
की 
वालिद साहब की निगाहे हम पर पड़ी
यु दरख्तों सा बैठा देख कुछ कह ना सकी,

तभी हम थोड़ा मुस्कुराये
आँखो से आंसू बह आए
वालिद साहब कसमसाए,

थोड़ी सी हैरानी-थोड़ी सी परेशानी
उनकी आँखो से झलक रही थी
हमारी निगाहो से ना जाने कुछ कह रही थी,

परेशानियां उनकी और ना बढ़ा कर
हम संग हो लिए उनके मुस्कुरा कर

कसक तो कुछ अब भी हे
वो यादो के सहारे हम अब भी हे,

पर हो कुछ भी हम ये कभी ना भूल पाएगे
संग बिताए वो पल बड़े याद आएगे,

वो भी क्या दिन थे 
वो भी क्या दिन थे
कहते रह जाएगी |

तनहा

यु तनहा छोड़ जाने की सजा जरूर मिलेगी,

आँखो में होगे अश्क़ और खुशिया भी बहुत मिलेगी,

यु हर पल हर वक्त हमे सताने की,

यु वक्त बेवक्त हमे जगाने की,

पास रहकर दूर चले जाने की,

सजा जरूर मिलेगी
क्युकी अब यादें ही बस रहेगी
और यादें ही रहेगी |

महोबत

वो आदत ही क्या छूट जाये और वो आस ही क्या जो टूट जाये
हम तो करते थे उनसे महोबत मगर ऐसी महोबत ही क्या जिसमे हम लूट जाये |

खुदगर्ज़

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तुम हमसे खफा रहे
हमे इस बात का कोई इल्म नहीं,

कभी मुस्कुराकर देख लो
क्या अब इतना भी हक़ हमारा नहीं,

ना तब तुझसे कुछ माँगा था ना अब तुझसे कुछ चाहते है
हर ख़ुशी हर सुख तेरे लिए ही तो लुटते हे,

किसी का दिल तोड़कर क्या अब अपना आशियाना बसा पाओगे
यकीनन अब जिंदगी मे खुश ना तुम रह पाओगे

वो भी इतना खुदगर्ज़ नहीं जो
बचा ले तुम्हे-पा ले तुम्हे,

खुद हारकर अब दुसरी को क्या हरा पाओगे तुम,

नफरत भी ना निभा पाओगी तुम तोह मुझसे
जितनी शिददत से प्यार निभाया है हमने |